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स्थायी विकास के लिए किसी भी कीमत पर वनों का दायरा नष्ट नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली:(सीधीबात न्यूज़ सर्विस)   उच्चतम न्यायालय ने बीते शुक्रवार को गोवा सरकार से कहा कि वह ‘स्थायी विकास’ के खिलाफ नहीं है लेकिन किसी भी कीमत पर वनों का दायरा नष्ट नहीं किया जाना चाहिए.

शीर्ष अदालत ने कहा कि प्राधिकारी सिर्फ इस वजह से गोवा को बर्बाद नहीं कर सकते कि उनके यहां राष्ट्रीय औसत से अधिक वन क्षेत्र है.

न्यायालय ने यह भी कहा कि वह उन राजनीतिकों के खिलाफ है जो अपने अनैतिक मकसदों के लिए न्यायालय के आदेशों का इस्तेमाल करते हैं.

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ‘हम स्थायी विकास के लिए आपके साथ हैं परंतु इसका मतलब यह नहीं कि आप वन क्षेत्र नष्ट करेंगे.’

मेहता ने पीठ से कहा कि गोवा में करीब 62 फीसदी वन क्षेत्र है जो कि राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है.

इस पर पीठ ने कहा, ‘तो क्या यह आपको इसे नष्ट करने का अधिकार देता है? आप खुशकिस्मत हैं कि आपके पास इतना वन क्षेत्र है. हमारा अनुरोध है कि इसे नष्ट न करें.’

मेहता ने न्यायालय से कहा कि वे वन क्षेत्र को कतई नष्ट नहीं करना चाहते और वह गोवा में वृक्षों की कटाई की अनुमति भी नहीं मांग रहे हैं.

पीठ गोवा से संबंधित एक मामले में शीर्ष अदालत के चार फरवरी, 2015 के आदेश में सुधार के लिए दायर आवेदन पर सुनवाई कर रही थी.

शीर्ष अदालत ने 2015 में निर्देश दिया था कि गोवा में प्राधिकारी किसी भी एक भूखंड के स्वरूप को बदलने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं देंगे जिसमें प्राकृतिक वनस्पतियां और घने वृक्ष हैं.

इस मामले में सुनवाई के दौरान मेहता ने कहा कि यदि यह आदेश प्रभावी रहा तो गोवा के किसी भी क्षेत्र में विकास नहीं हो सकेगा.

इस पर पीठ ने कहा, ‘कैसा विकास? आप गोवा को भी बर्बाद करना चाहते हैं. कल ही हमें बताया गया था कि पचमढ़ी (मध्य प्रदेश में) नष्ट हो चुकी है.’

पीठ ने कहा, ‘यदि आप किसी परियोजना विशेष के लिए आए हैं तो हम इसके खिलाफ नहीं हैं. हम राजनीतिज्ञों के खिलाफ हैं जो हमारे आदेशों को अपने स्वार्थों की खातिर इस्तेमाल करते हैं.’

मेहता ने पीठ से कहा कि इस आवेदन पर सुनवाई की जानी चाहिए तो न्यायालय ने इसे 23 सितंबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया.

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