अंतरराष्ट्रीय

रॉबर्ट मुगाबेः जिम्बाब्वे की आजादी का वह नायक जिसे अर्थव्यवस्था ने बनाया खलनायक

जिम्बाब्वे के पूर्व राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे का शुक्रवार को सिंगापुर में निधन हो गया. 95 साल की उम्र में अंतिम सांस लेने वाले मुगाबे की गिनती अफ्रीका के महान क्रांतिकारियों में होती है. वह ऐसे नेता हैं, जो अपने देश को ब्रिटिश शासन से आजादी दिलाकर नायक के रूप में उभरा, लेकिन सत्ता के मोह का त्याग नहीं कर पाने के कारण बेआबरू होकर सत्ता से बेदखल हुआ.

जिम्बाब्वे की आजादी के नायक मुगाबे को अर्थव्यवस्था की बदहाली ने खलनायक बना दिया. उनके शासनकाल  में बेरोजगारी, महंगाई ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए और अंत में स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान करती रही जिस सेना का इस्तेमाल मुगाबे ने अपने विरोधियों के दमन में किया, उसी सेना के आगे उन्हें हथियार डालने पड़े. सन 2017 में सेना द्वारा तख्तापलट किए जाने के बाद मुगाबे ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया.

पिता बढ़ई, अध्यापिका थीं मां

दक्षिणी रोडेशिया (अब जिम्बाब्वे) के कुटामा में जन्मे रॉबर्ट मुगाबे के पिता दक्षिण अफ्रीका के एक जेसुइट मिशन में बढ़ई का कार्य करते थे और उनकी मां अध्यापिका थीं. मुश्किलों में गुजरे बचपन के बाद जीविकोपार्जन करते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले मुगाबे ने सन 1963 में अपने सहयोगियों के साथ तंजानिया में जिम्बाब्वे अफ्रीकन नेशनल यूनियन (जेडएएनयू) संगठन की स्थापना कर ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की.

छापामार युद्ध को बनाया था प्रमुख अस्त्र

उसी साल मुगाबे को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. मुगाबे ने जेल में रहते हुए आंदोलन में छापामार युद्ध को अपना प्रमुख अस्त्र बनाया. सन 1974 में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के प्रति पूरी वफादारी के वादे के साथ प्रधानमंत्री बने इयान स्मिथ की सरकार ने मुगाबे को जाम्बिया जाने की अनुमति देकर जेल से रिहा किया. मुगाबे ने छापेमार युद्ध में माहिर लोगों की टुकड़ी बनाई और वापस जिम्बाब्वे लौट आए.

जिम्बाब्वे को 1980 में मिली आजादी

जिम्बाब्वे को सन 1980 में ब्रिटिश शासन से आजादी मिल गई और मुगाबे स्वतंत्र जिम्बाब्वे के पहले प्रधानमंत्री चुने गए. आजादी के बाद पहली बार प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद मुगाबे सत्ता से ऐसे चिपके, कि उनका शासन 37 वर्ष बाद तक चलता रहा. मुगाबे ने 1987 में स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर लिया था. वह 93 साल की उम्र तक देश के राष्ट्रपति पद पर बने रहे. हालांकि जिम्बाब्वे के चुनावों की निष्पक्षता शक के घेरे में ही रही.

जिसने दिलाई थी सत्ता, वही बनी हटने की वजह

जिम्बाब्वे को जिस समय आजादी मिली, देश की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल थी. रॉबर्ट मुगाबे ने जब सत्ता संभाली, उनके सामने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कड़ी चुनौती थी. मुगाबे ने सन 1989 में पंचवर्षीय योजना लागू करने के साथ ही किसानों के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की.

पहली पंचवर्षीय योजना के बाद खनन, विनिर्माण और कृषि क्षेत्र का विकास भी हुआ, लेकिन मुगाबे इस वृद्धि को बरकरार नहीं रख सके. मुगाबे ने सन 2000 के चुनावों में पिछड़ने के बाद गोरों की संपत्ति सरकार के कब्जे में ले ली थी. इस कदम से वह सत्ता बचाने में तो कामयाब रहे, लेकिन अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई.

नतीजा यह हुआ कि देश में बेरोजगारी की दर 90 फीसदी पहुंच गई और महंगाई दर 23 करोड़ प्रतिशत. नतीजा यह हुआ कि जिम्बाब्वे की जनता को भूख, सरकार को नकदी के संकट से जूझना पड़ा. मुगाबे सरकार को अपने ही देश में अपनी करेंसी तक बंद करनी पड़ गई.

विफलताओं के अंबार में शिक्षा उपलब्धि

वैसे तो रॉबर्ट मुगाबे की सरकार आर्थिक समेत तमाम मोर्चों पर असफल रही, लेकिन शिक्षा मुगाबे की उपलब्धि भी रही. मुगाबे ने अश्वेत आबादी के लिए अलग स्कूल और हॉस्पिटल खोले. जिम्बाब्वे में साक्षरता की दर लगभग 90 फीसदी है, जो अफ्रीकी देशों में सर्वाधिक है.

सेना क्यों हो गई खिलाफ?

रॉबर्ट मुगाबे अपने विरोधियों के दमन के लिए सेना का इस्तेमाल करने से नहीं हिचकते थे, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे इमर्सन मनांगाग्वा को उप राष्ट्रपति पद से बर्खास्त करने के निर्णय के बाद सेना उनके खिलाफ हो गई.

सेना को लगा कि कहीं मुगाबे अपनी पत्नी ग्रेस को सत्ता न सौंप दें. पूरे देश में उबाल था ही, सेना ने तख्तापलट कर दिया और जिम्बाब्वे में रहने देने के साथ ही गिरफ्तार न किए जाने की शर्त पर मुगाबे ने 37 वर्ष बाद जिम्बाब्वे की सत्ता से दूरी बनाते हुए पद से इस्तीफा दे दिया था.

Source:-Aajtak

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